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शुध्द के लिए युध्द से ही बनेगा भारत श्योर फॉर प्योर
December 6, 2019 • R. K. SRIVASTAVA / NIRAJ PANDEY • लेख


त्योहारों के मौसम से ठीक पहले अगस्त की शुरुआत में ही मप्र में सरकार की सख्ती ने मिलावटी दूध, पनीर, मावा के पूरे प्रदेश में कई मामलों को उजागर किया जिनमें कुछ पर रासुका जैसी कार्रवाई भी की गई। मिलावटखोरों की जानकारी देने वालों को 11000 रुपए का ईनाम साथ ही नाम गोपनीय रखने का जो भरोसा देकर एक हेल्प लाइन नंबर कर दिया गया। परिणाम भी दिखे कि मिलावटखोर कारोबार समेट दूसरा ठिकाना ढ़ूंढ़ने मजबूर दिखने लगे। यही क्या कम है कि कहीं से एक अच्छी शुरुआत तो हुई। 
पहला सच पूरे देश में अब भी मिलावटखोरों के हौसले इस कदर बुलंद हैं कि खाने पीने के सामानों में खासतौर पर सिन्थेटिक दूध, सिन्थेटिक पनीर और नकली मावा जो लिक्विड डिटरजेंट, ग्लूकोज पाउडर में रसायन मिलाकर तैयार किया जाता है के अलावा दूसरी चीजों की लंबी फेहरिस्त है। जबकि खतरनाक रसायनों से बनी श्रंगार सामग्री व नकली दवाओं के बेफिक्र कारोबार ने देश के स्वास्थ्य को अलग चुनौती दे रखी है। साग-सब्जियों को ताजा व बढ़िया दिखाने खातिर नुकसानदेह रासायनिक लेपों के अलावा रातों रात इंजेक्शन से बढ़ने वाली सब्जियों तथा पकने वाले फल सब कुछ सेहत पर बहुत भारी पड़ रहे हैं। मिलावटी खाद्य तेल, गुटखा और विदेशों से आने वाली दालों में बड़ी मात्रा में कीटनाशकों का मौजूदगी भी डराने वाली है। इन्हीं सबका नतीजा है कि इंसान स्वास्थ्य के प्रति चौकन्ना रहकर भी अनजाने और मजबूरन गंभीर बीमारियों को दावत  दे हर निवाले के साथ निगल रहा है।
दूसरा सच रुपयों के खातिर मिलावटखोरों ने इंसानियत की सारी हदों को पार कर बीमारों को नकली दवा तक थमा दी। कुछ ही महीने पहले ऑनलाइन कारोबार से तमाम जगहों से बेहद सस्ते दामों पर जयपुर पहुंची नकली दवाओं की बड़ी खेप ने रोंगटे खड़े कर दिए। जब दवाओं ने असर नहीं दिखाया तो हो हल्ला मचा फिर जांच हुई जिससे पता चला कि दिल, शुगर और ब्लड प्रेशर की नकली दवाएं दिल्ली, सिक्किम और राजस्थान से आई थीं।  
तीसरा सच बेहद हैरानी भरा है। चंद महीने पहले ही मुंबई की जानी मानी गोधुम ग्रेन्स एण्ड संस के अध्यक्ष शिव शंकर गुप्ता ने चौंकाने वाला खुलासा किया जिसमें पूरे देश में सुबह से शाम तक खाए जाने वाले नामी ब्रांडों के प्रीमियम नमक में जहरीले रसायन का मुद्दा है। पोटेशियम फेरोसिनेसाइड रसायन एक जहर है जिसकी कुछ मात्रा से नमक का ब्लीचिंग प्रोसेस होता है। कंपनियां जहां निर्धारित मात्रा में प्रयोग का दावा करती हैं वहीं जानकार बताते हैं कि केवल 1.90 से 4.91 मिलीग्राम तक कैंसर के लिए काफी है। अमेरिका की वेस्ट एनालिटिकल लेबोरेट्रीज यानी डब्ल्यूएएल ने भारत की कई ब्रांडेड कंपनियों के नमक यह रसायन जो कार्सिनोजेनिक होता है को पाया जिससे कैंसर होता है। हैरानी वाली बात यह है कि अमेरिका, जर्मनी सहित 56 देशों ने नमक में उपयोग पर बैन लगा रखा है लेकिन भारत में धड़ल्ले से जारी है। आरटीआई से ही यही खुलासा हुआ कि एफएसएसएआई यानी भारतीय खाद्य संरक्षा एवं मानक प्राधिकरण ने इस नमक की कभी जांच नहीं की।
चौथा सच, एम्स के स्किन विभाग के डॉक्टरों की हालिया स्टडी के खुलासे ने सभी को चिन्ता में डाल दिया। रोज इस्तेमाल होने वाले हर्बल हेयर डाई और दूसरे सौंदर्य प्रसाधन तक खतरनाक हैं? डॉक्टरों ने बाजार में बिक रहे 50 नामी हर्बल प्राडक्टों जिनमें बालों को रंगने वाली मेंहदी, कॉस्मेटिक क्रीम्स, सिन्दूर, बिन्दी, कुमकुम, फेयरनेस क्रीम शामिल हैं को सुरक्षित नहीं पाया। आईआईटी रुड़की, एम्स ऋषिकेश के साथ हुई ज्वाइन्ट स्टडी में पता चला कि हेयर डाई और हर्बल मेंहदी में भी खतरनाक रसायन पीपीडी बिना जानकारी दिए मिला देते हैं। जबकि बिन्दी, कुमकुम, सिन्दूर में किस स्तर के एजोडाइज केमिकल का उपयोग होता है कोई नहीं जानता। 
ऐसे सैकड़ों क्या हजारों सच की लंबी फेहरिस्त बन जाएगी। सवाल यह कि ऐसा कब तक चलेगा? अगस्त 2016 में सुप्रीम कोर्ट ने मिलावट को गंभीर मुद्दा बताते हुए केंद्र और राज्य सरकारों को फूड सेफ्टी ऐंड स्टैंडर्ड्स एक्ट-2006 को प्रभावी तरीके से लागू करने के निर्देश दिए तब सरकार हरकत में आई और मिलावटखोरों के बढ़ते हौसलों से आम जनजीवन की सेहत को लेकर फिक्र मन्द हुई। एफएसएसएआई को कहना पड़ा कि ''कोई भी व्यक्ति जो खाद्य पदार्थ में ऐसे किसी पदार्थ की मिलावट करता है जो मानव उपभोग के लिए घातक है तथा मृत्यु भी हो सकती है तो ऐसे मिलावटखोर को अधिकतम उम्र कैद की सजा तथा कम से कम दस लाख रुपये का जुर्माना हो सकता है। सिंगापुर की तरह सेल्स ऑफ फूड एक्ट की तैयारी है जिसमें मिलावट गंभीर अपराध है। ऐसे ही कड़े प्रावधान उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 2019 में हुए हैं जिसमें उपयोग करने वाले को उपभोक्ता मानकर बिक्री के लिए मिलावटी उत्पादों का संग्रहण,बिक्री या आयात करने पर अलग-अलग सजा का प्रावधान है जिसमें छह महीने से आजन्म कैद तथा एक लाख से दस लाख रुपए तक का जुर्माना व सजा दोनों तय की गई है। मिलावटखोरों को मुंहतोड़ जवाब और निपटने के लिए कानून से ज्यादा राज्यों और अधिकारियों की मजबूत इच्छा शक्ति की जरूरत है। इसके लिए टीवी अनुपमा जैसी केरल की तेज तर्रार फुड कमिश्नर एक नजीर हैं। जिन्होंने 15 महीनों में छह हजार से ज्यादा नमूने जांचे और मिलावटखोरी साबित होने पर 750 व्यापारियों पर मुकदमें चलाए और अरबों रुपए के गोरखधंधे की चूलें हिला दीं। लेकिन हर जगह ऐसे अधिकारी नहीं हैं। 
वक्त का तकाजा है कि लंबे-चौड़े मौजूदा कानूनों की छटनी हो तथा स्वास्थ्य के लिए जरूरी व उपयोगी सभी वस्तुएं चाहें खाने की हों, इलाज की हों या साजो श्रंगार, सौंदर्य से संबंधित हों फिर देशी हों या विदेशी, सभी एक विभाग एक कानून और एक छत के दायरे में आएं। शिकायत मिलते ही तत्काल जांच और परीक्षण हो तथा निर्माता, विक्रेता, इम्पोर्टर यानी हर वो कड़ी जो जीवन के खिलवाड़ करे सभी पर जघन्यतम अपराध जैसा प्रकरण कायम हो और अदालतों में तुरन्त सुनवाई भी हो। किसी भी दशा में मामले का छोटी से लेकर बड़ी अदालत तक में महज 6 महीनों में निपटारा हो ताकि मिलावट के नाम ही लोग तौबा-तौबा करें तभी भारत को मिलावट के नासूर से मुक्ति मिल पाएगी। इतना तो लगता है कि शुध्द के लिए युध्द की देश के भीतर ही अघोषित लड़ाई अब अपने मुकाम पर है और मिलावट से निर्णायक जंग जारी रही तो वह दिन दूर नहीं जब भारत श्योर फॉर प्योर का दर्जा पाने वाला दुनिया का पहला मुल्क भी बन सकता है। चाहे होली हो दीवाली, गणेशोत्सव  हो या नवरात्रि, रमजान, ईद हो या क्रिसमस ऐसे मौकों पर ही क्यों पूरे देश को पूरे बारहों महीने और 365 दिन शुध्द खाद्य सामग्री उपलब्ध हो इस बात का अधिकार देशवासियों को है तो फिर क्यों न ऐसा कानून बने और सख्ती से अमल भी हो और सरकार श्योर फॉर प्योरी की गारण्टी दे तभी देश को मिलावट की त्रासद से मुक्ति मिल पाएगी वरना कितने ही कानूनों के जैसे मिलावट पर भी एक निष्प्रभावी कानून बन जाएगा जिसके मायने कुछ नहीं निकलेंगे।