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किसे है गरीब मजदूरों की जान की फिक्र?
December 15, 2019 • R. K. SRIVASTAVA / NIRAJ PANDEY • लेख

दिल्ली में 43 मौतों का जिम्मेदार कौन?

 


देश की राजधानी दिल्ली में अनाज मंडी इलाके में 8 दिसम्बर को सुबह-सुबह सोते हुए ही करीब 43 लोग मौत के मुंह में समा गए। हादसा एक मकान में बहुमंजिला इमारत में चल रही फैक्टरी में सुबह करीब 5.22 बजे शॉर्ट सर्किट के कारण आग लगने से हुआ। हादसे के समय फैक्टरी में 100-150 लोग मौजूद थे, जो रात के समय भी यहीं सोते थे। इन्हीं में से कईयों की मौत दम घुटने से हुई। रानी झांसी मार्ग इलाके में अनाज मंडी में लगी यह आग इतनी भयानक थी कि उस पर काबू पाने के लिए दमकल की 30 गाडि़यों को लगाया गया। यह दिल्ली का अभी तक का सबसे बड़ा रेस्क्यू ऑपरेशन इसलिए बताया जा रहा है क्योंकि पुलिस और दमकलकर्मी काफी मशक्कत के बाद मौके तक पहुंच पाए और फिर भी 50 से ज्यादा लोगों को बचा लिया गया। रिहाइशी इलाके में चल रही इस फैक्टरी में स्कूल बैग तथा खिलौने बनाए जाते थे और आग लगने के समय फैक्टरी में इसी तरह का सामान भरा हुआ था, जिसके आग पकड़ने से आग बहुत तेजी से फैली और देखते ही देखते इतने सारे लोग मौत की नींद सो गए। आश्चर्य की बात यह है कि इस इलाके में गलियां काफी संकरी हैं और आग से बचने के कोई इंतजाम नहीं हैं लेकिन प्रशासन की नाक तले इस तरह के इलाकों में इस प्रकार की बड़ी-बड़ी फैक्टरियां धड़ल्ले से चलती रहती हैं, जिन पर कभी कोई कार्रवाई नहीं होती। जब कभी इस तरह का कोई दर्दनाक हादसा सामने आता है, तभी इस प्रकार की अव्यवस्थाओं पर हो-हल्ला मचता है किन्तु कुछ ही दिनों बाद सब कुछ शांत हो जाता है और सब पहले की ही भांति चलने लगता है। उक्त घटना के संबंध में यह सनसनीखेज तथ्य भी सामने आया है कि फैक्टरी के भीतर रात के समय दर्जनों मजदूर सो रहे थे लेकिन फैक्टरी के मुख्य द्वार पर बाहर से ताला लगा था। ऐसे में सवाल यह है कि आखिर दिल्ली में हुई इन 43 मौतों का जिम्मेदार कौन है?
दिल्ली के विभिन्न इलाकों से इस तरह से आग लगने और बड़ी संख्या में लोगों के मारे जाने की घटनाएं लगातार सामने आती रही हैं लेकिन प्रशासन की ओर से कभी ऐसी सख्ती नहीं बरती गई, जिससे आगजनी की इस तरह की घटनाओं पर अंकुश लग सकता। लोगों के स्मृति पटल में वर्ष 1997 का 'उपहार कांड' अब तक तरोताजा है, जो दिल्ली का अब तक का सबसे खौफनाक अग्निकांड माना जाता है। 13 जून 1997 को उपहार सिनेमा में लगी उस आग में 59 लोगों ने अपनी जान गंवाई थी। उपहार कांड में इमारत के मालिकों को अग्निकांड का दोषी पाया गया था और उनमें से एक दोषी गोपाल अंसल को सिर्फ एक साल की ही सजा हुई थी, जो वर्ष 2017 में जेल की सजा पूरी होने के बाद छूट गया। ऐसे में बेहद गंभीर सवाल यही उठता है कि हमारे देश में लोगों की जान क्या इतनी सस्ती है कि सिस्टम इस तरह उनकी जिंदगी से खेलता है? इसी का ताजा उदाहरण है रविवार सुबह हुए अग्निकांड में हुई 43 लोगों की दर्दनाक मौतें।
21 जनवरी 2018 को बवाना औद्योगिक क्षेत्र में तीन फैक्टरियों में भीषण आग लगी थी और उस हादसे में 17 लोगों की मौत हुई थी। उस समय खुलासा हुआ था कि उस इलाके में अवैध रूप से फैक्टरियां चल रही हैं। हकीकत यह है कि ऐसी ही अवैध फैक्टरियां दिल्ली के अनेक इलाकों में बरसों से चल रही हैं, जिनमें सुरक्षा के कोई उपाय नहीं किए जाते। तमाम जिम्मेदार सरकारी विभागों को ऐसी फैक्टरियों की पूरी जानकारी भी होती है लेकिन कोई ऐसे कदम नहीं उठाए जाते, जिससे ऐसे दर्दनाक हादसों को टालने में मदद मिले। इसी साल 12 फरवरी 2019 को जब करोलबाग के होटल अर्पित में लगी भयानक आग में 17 लोगों ने अपनी जान गंवाई थी, तब दिल्ली सरकार के मंत्री सत्येंद्र जैन ने खुलासा किया था कि होटलों का कवरेज एरिया बढ़ाकर उनकी छत पर रेस्टोरेंट बना लिया जाता है, जो कई बार हादसों का कारण बनता है। होटल अर्पित में आगजनी के मामले की पड़ताल करने पर यह खुलासा भी हुआ था कि करोलबाग के उस इलाके में चार मंजिल से ज्यादा नहीं बनाई जा सकती किन्तु अगर वह होटल छह मंजिला बनाया जा सका तो आखिर कैसे वह सब संभव हुआ? करोलबाग जैसे इलाके में क्या यह सब एमसीडी की नजर में कभी नहीं आया या वह सब 'मिलीभगत' के चलते ही हुआ था? ऐसे ही न जाने कितने ही होटल अर्पित या फैक्टरियां दिल्ली में जगह-जगह चल रही हैं, जो हर कदम पर बड़े हादसों को न्यौता दे रही हैं लेकिन न जाने प्रशासन की तंद्रा कब टूटेगी? होटल अर्पित अग्निकांड हादसे के बाद अग्निशमन विभाग ने करोल बाग में 45 होटलों की जांच की थी और तब यह चौंका देने वाला तथ्य सामने आया था कि और उनमें से 30 होटल फायर सेफ्टी नियमों में फेल हो गए थे। ऐसे हादसों के बाद कई बार ऐसे मामले भी सामने आए हैं, जब देखा गया कि जिन होटलों, रेस्टोरेंट तथा फैक्टरियों को अग्निशमन विभाग द्वारा एनओसी दी गई, उनमें आग बुझाने वाले उपकरण काम ही नहीं कर रहे थे।
दिल्ली हो या देश का अन्य कोई इलाका, कोई भी बड़ा हादसा हमें सबक के साथ-साथ कड़वे अनुभव भी देकर जाता हैं लेकिन विड़म्बना यह है कि हमारे यहां इस तरह के हादसों या गलतियों से कभी कोई सबक नहीं लिया जाता। ऐसे हादसों में एक ही पल में कितने ही परिवारों के घर के चिराग बुझ जाते हैं। ऐसे हादसों के बाद सदैव एक ही सवाल सामने आता है कि आखिर इन हादसों का जिम्मेदार कौन है और जवाब भी प्रायः एक ही मिलता है कि यह सब सिस्टम के निकम्मेपन का नतीजा है? दरअसल हमारे देश में आम जनता की हैसियत ही कुछ ऐसी बनकर रह गई है कि वे गड्ढ़ों में गिरकर, जर्जर इमारतों के नीचे या पुल गिरने से उसके नीचे दबकर, ट्रेन से कटकर मरते रहते हैं या विभिन्न इमारतों में आग लगने से जिंदा जलकर अथवा दम घुटकर मर जाते हैं और ऐसी घटनाओं पर कुछ पलों के लिए शोक व्यक्त करके या थोड़ी देर आंसू बहाकर सारा दोष सिस्टम पर डालकर बगैर कोई सबक लिए कुछ ही दिनों में ऐसे हादसों को भुला दिया जाता है। सवाल यह है कि जिस सिस्टम को हम कोसते रहते हैं, वह आखिर है क्या? यह किसी एक व्यक्ति का चेहरा नहीं है बल्कि जिन लोगों पर ऐसे हादसों को रोकने और नियंत्रण की जिम्मेदारी होती है, वही अगर भ्रष्ट, लापरवाह तथा लालची प्रवृत्ति के हों तो यही हमारा दोषपूर्ण सिस्टम है, जो अपने स्वार्थ के वशीभूत ऐसे हादसों को लेकर अपनी आंखें और कान बंद किए रहता है। ऐसे में इस प्रकार के हादसों में मारे जाने वाले गरीब मजदूरों की जान की फिक्र ही भला किसे है? सिस्टम के इसी नाकारापन के चलते अक्सर तमाम नियमों और कायदे-कानूनों का उल्लंघन होता रहता है और अचानक ही कोई ऐसा हादसा सामने आ जाता है, जिससे अनेक घरों के चिराग बुझ जाते हैं।
वर्ष 1997 के उपहार कांड के बाद से लेकर अब तक दिल्ली में भीषण आग की कई घटनाएं सामने आ चुकी हैं। उस भयावह हादसे को बीते 22 वर्ष का लंबा समय गुजर चुका है किन्तु आज भी विड़म्बनापूर्ण स्थिति यह है कि इस दिशा में एक-दूसरे पर दोष मढ़ने के अलावा कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है। दिल्ली के विभिन्न आवासीय क्षेत्रों में ऐसी घटनाओं में अक्सर अवैध फैक्टरियां चलने तथा सिनेमाघरों, होटलों, रेस्टोरेंट इत्यादि में आग से सुरक्षा के पर्याप्त इंतजाम के अभाव की बातें सामने आती रही हैं लेकिन प्रशासन हमेशा किसी बड़े हादसे को न्यौता देता प्रतीत होता है। कोई भी ऐसी हृदयविदारक घटना सामने आने के बाद सदैव फायर ऑडिट की बातें की जाने लगती हैं लेकिन ऐसे ऑडिटों का अंततः क्या हश्र होता है, कोई नहीं जानता। कोई बड़ा हादसा सामने आने पर एक-दूसरे पर कीचड़ उछालने और दोष मढ़ने की कवायद शुरू हो जाती है लेकिन जैसे ही मामला थोड़ा ठंडा पड़ता है, फिर सब कुछ पुराने ढ़र्रे पर रेंगने लगता है और सारी एजेंसियां ऐसी ही किसी और घटना के इंतजार में गहरी नींद सो जाती हैं। जब तक अपना कर्त्तव्य ईमानदारी से नहीं निभाने वाले और ऐसे हादसों के लिए जिम्मेदार अधिकारियों व कर्मचारियों पर सख्त से सख्त कार्रवाई किए जाने की व्यवस्था नहीं होगी, ऐसे हादसे रह-रहकर इसी तरह सामने आते रहेंगे और हम इसी प्रकार उन पर शोक व्यक्त करके अपनी बेबसी पर आंसू बहाते रहेंगे।