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भारत बना प्रयोगशाला
December 12, 2019 • R. K. SRIVASTAVA / NIRAJ PANDEY • लेख

 पहले 'नोटबंदी'.... अब 'मुस्लिम बंदी'.....।
केन्द्र की मौजुदा भारतीय जनता पार्टी को सरकार ने भारत को एक प्रयोगशाला में तब्दील कर दिया है, इस बात की परवाह किये बिना इससे देश व उसके रहवासियों पर क्या प्रभाव पड़ेगा? अपने पहले कार्यकाल में जहां प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने आठ नवम्बर 2017 को अचानक नोटबंदी की घोषणा कर पूरे देश को चैका दिया था, जिसके कारण पूरे देश के निवासियों को कठिन आर्थिक संकट के दौर से गुजरना पड़ा, जिसका असर आज भी दिखाई दे रहा है, वहीं इस सरकार ने अपने दूसरे कार्यकाल मंे तीन तलाक बंदिश व जम्मू-कश्मीर से धारा-370 हटाने के बाद अब नागरिकता संशोधन विधेयक के जरिये विदेशी मुसलमानों के भारत प्रवेश पर बंदिश लगा दी है, विशेषकर पाकिस्तान बांगला देश और अफगानिस्तान सहित आधा दर्जन देशों से भारत आने वाले मुस्लिमों के लिए यह बंदिश लगाई गई है, जबकि इन्हीं देशों से भारत आने वाले गैर मुस्लिमों के लिए भारत के द्वार खोलकर उन्हें यहां की नागरिकता देना मंजूर किया है। केन्द्रीय मंत्री परिषद ने इस प्रस्तावित विधेयक को मंजूरी दे दी है तथा अब इसे संसद के दोनों सदनों की मंजूरी हेतु पटल पर रखे जाने की तैयारी की जा रही है।
यद्यपि भारत की नागरिकता को जांचने परखने का कानून बनाने की तैयारी पिछले करीब तीन दशकों से चल रही थी, मौजूदा भाजपा सरकार ने भी अपने पहले कार्यकाल में इस विधेयक को लोकसभा से पारित करवा भी लिया था, किंतु लोकसभा का कार्यकाल खत्म हो जाने व लोकसभा के भंग हो जाने के कारण यह विधेयक राज्यसभा में प्रस्तुत नहीं किया जा सका था, इसलिए अब इसे संशोधित कर पुनः संसद के दोनों सदनों से पारित करवाने की तैयारी की गई है, इस विधेयक के माध्यम से जहां इन छः देशों से भारत आने वाले मुस्लिमों को घुसपैठिये बताया जा रहा है, वहीं इन्हीं देशों से भारत आने वाले गैर मुस्लिमों को शरणार्थी बताया जा रहा है, शरणार्थियों के लिए यहां की नागरिकता का प्रावधान रखा गया है, जबकि इन देशों से भारत आने वाले गैर मुस्लिमों को यहां की नागरिकता के योग्य समझा गया है। उक्त विधेयक में उक्त भेदभाव का कोई विशेष कारण नहीं बताया गया है। इसके अलावा इस विधेयक में यह भी स्पष्ट किया गया है कि इन आधा दर्जन देशों से भारत में प्रवेश करने वाले गैर मुस्लिमों को एक साल के अंदर ही भारत की नागरिकता प्रदान कर दी जाएगी, जबकि मुस्लिमों को कभी भी नागरिकता नही दी जाएगी। इस विधेयक में गैर मुस्लिमों के धर्मों का भी उल्लेख किया गया है, जो हिन्दू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई है। मौजूदा कानून के अनुसार किसी भी विदेशी को भारतीय नागरिकता के लिए भारत में ग्यारह साल रहने का प्रतिबंध है, लेकिन नए संशोधन विधेयक के माध्यम से इस प्रतिबंध को शिथिल कर एक से छः साल किया जा रहा है, साथ ही गैर मुस्लिम वैध दस्तावेजों के बिना पाए गए तो उन्हें जेल नहीं होगी, तथा दिसम्बर 2014 तक भारत पहुंचे गैर मुस्लिमों को सजा का कोई प्रावधान नहीं है, उन्हें तत्काल भारत की नागरिकता प्रदान कर दी जाएगी।
यद्यपि अभी इस संशोधन विधेयक को संसद में प्रस्तुत नहीं किया गया है, सिर्फ केबीनेट ने इसे मंजूरी प्रदान की है, किंतु कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस, डी.एम.के. समाजवादी पार्टी, वामदल और आरजेडी ने इस विधेयक का विरोध शुरू कर दिया है, इनका तर्क है कि इस विधेयक में मुस्लिम समुदाय पर निशाना साधा गया है। यह संशोधन विधेयक संविधान के अनुच्छेद चैदह का उल्लंघन है और समानता के अधिकार की बात करता है, श्रीलंका और नेपाल के मुस्लिमों को भी इसमें शामिल किया जाना चाहिये। पूर्वोत्तर राज्यों का कहना है कि बंगला देश से बड़ी तादाद में आए हिन्दूओं को नागरिकता देने से मूल निवासियों के हकों में कटौती हो जाएगी।
इन दलीलों के साथ गैर भाजपाई दल जो इस संशोधन विधेयक के खिलाफ है, उनका आरोप है कि इस संशोधन विधेयक के माध्यम से भाजपा की सरकार भारत को हिन्दू राष्ट्र बनाने के मार्ग पर आगे बढ़ रही है, क्योंकि भाजपा और संघ का कहना है कि भारत के कई राज्यों में अब हिन्दू अल्पसंख्यक हो गए है, तथा गैर हिन्दूओं की संख्या बढ़ गई है। 
संसद के मौजूदा शीत कालीन सत्र में ही इस संशोधित विधेयक को प्रस्तुत करने की सरकार की तैयारी है, इसलिए संसद में हंगामा निश्चित है, क्योंकि विधेयक प्रस्तुतिकरण के पहले से ही गैर भाजपाई दल अपने तीखे तैवर दिखाने लगे है, लोकसभा में तो सत्तारूढ़ एनडीए बहुमत में है, इसलिए इसे वहां से पुनः पारित कराने में दिक्कत नहीं होगी, किंतु राज्यसभा से इसे पारित कराने में मोदी-शाह को पसीना आ सकता है। फिर विरोध का सबसे बड़ा कारण यही बताया जा रहा है कि मुस्लिम व गैर मुस्लिम के प्रति नागरिकता देने में भेदभाव के प्रति नागरिकता देने में भेदभाव के प्रति सरकार ने कोई विशेष कारण नहीं बताया है और न वह बताने को तैयार ही है।
इसलिए कुल मिलाकर सरकार के लिए यह 'मुस्लिम बंदी' नोटबंदी से भी भारी साबित हो सकती है। 
12दिसम्बर/ईएमएस