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अपराधों पर अंकुश कब
January 11, 2020 • R. K. SRIVASTAVA / NIRAJ PANDEY • लेख

आमतौर पर सभी सरकारें बढ़-चढ़ कर दावा करती देखी जाती हैं कि वे जनता को अपराध-मुक्त और सुरक्षित माहौल मुहैया कराएंगी। मगर इस दावे की हकीकत यही है कि शायद ही कोई ऐसा दिन गुजरता है, जब लोगों को किसी जघन्य आपराधिक घटना का ब्योरा पढऩे-सुनने को नहीं मिलता। अब तो नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) ने भी अपनी रिपोर्ट में साफ कर दिया है कि देश में ऐसा कोई राज्य नहीं है, जहां अपराध न बढ़े हों। रिपोर्ट क्राइम इन इंडिया-2018 में बताया गया है कि सभी मेट्रो शहरों में अपराध के मामले में दिल्ली सबसे ऊपर है। रिपोर्ट के अनुसार, 2018 में दो लाख 37 हजार 660 जमानती मामलों के साथ दिल्ली 18 मेट्रो शहरों में अपराध के मामले में सबसे ऊपर रही। इस श्रेणी के पूरे आंकड़ों में दिल्ली का हिस्सा 29.6 प्रतिशत है, जिसमें भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) और विशेष व स्थानीय कानून (एसएलएल) शामिल हैं। 2016 के बाद से तीन सालों में दिल्ली ने लगातार अपराधों में वृद्धि देखी है। आंकड़ों के मुताबिक दिल्ली में 2017 में आईपीसी के 2,24,346 मामले दर्ज हुए थे जबकि साल 2016 में यह आंकड़ा दो लाख छह हजार 135 था।  चेन्नई 10.6 प्रतिशत की हिस्सेदारी के साथ सूची में दूसरे स्थान पर है। साल 2018 में यहां दर्ज किए गए अपराधों की कुल संख्या 85 हजार 27 थी जो कि 2017 में दर्ज 41 हजार 573 मामलों से काफी अधिक था। इस सूची में सूरत 7.5 प्रतिशत और मुंबई 7.1 प्रतिशत के साथ क्रमश: तीसरे और चौथे स्थान पर रहा। देश के 19 मेट्रो शहरों में 10 प्रतिशत की बढ़ोतरी देखने को मिली। दूरदराज के ग्रामीण इलाकों की तो दूर, शहरों-महानगरों तक में आम लोगों के बीच यह भरोसा नहीं है कि वे राह चलते किसी भयानक और बर्बर अपराध के शिकार नहीं हो जाएंगे। किसी भी राज्य में सरकार और शासन की उपस्थिति का अंदाजा इससे होता है कि वहां के लोग कानून के राज में खुद को सुरक्षित होने का अहसास करें और सहज रहें। दूसरी ओर, इसी शासन का प्रभाव ऐसा होना चाहिए कि संबंधित इलाके में मौजूद अपराधी तत्व पुलिस और प्रशासन की मुस्तैदी की वजह से खौफ खाएं और किसी भी अपराध को अंजाम देने की हिम्मत न करें। यह बेवजह नहीं है कि राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के मुताबिक देश भर में दर्ज होने वाली घटनाओं के आंकड़े हर अगली बार चिंता में इजाफा करते हैं। आखिर अपराधियों के बेलगाम होने की जिम्मेदारी किस पर जाती है? अगर सरकार अपराधियों से निपटने के लिए एक मुकम्मल और ठोस नीति पर काम करे और पुलिस महकमा अपनी ड्यूटी पर ईमानदारी से अमल करे, चौकस रहे तो क्या आपराधिक मानसिकता के लोग इस कदर बेखौफ मनमानी कर सकेंगे? सरकार की जिम्मेदारी आखिर क्या होती है? आम लोगों की सुरक्षा, उनके सहज और विकासात्मक जीवन की स्थितियां सुनिश्चित करने के लिए ही सरकार, प्रशासन और पुलिस महकमा ड्यूटी पर होते हैं। अगर इस जिम्मेदारी को पूरा करना इन सबको जरूरी और प्राथमिक नहीं लगता, तो यह सवाल लाजिमी है कि वे आखिर क्यों हैं!