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आधार के बाद सीएए- एनआरसी और एनपीआर की जरूरत क्यों
December 25, 2019 • R. K. SRIVASTAVA / NIRAJ PANDEY • लेख


संपूर्ण भारत में एनआरसी (नेशनल रजिस्टर फार सिविलियन) तथा सीएए (सिविलियन अमेंडमेंट एक्ट) को लेकर आंदोलन चल रहे हैं। पहले यह आंदोलन एक्ट के विरोध में शुरू हुए अब भाजपा ने भी समर्थन में देशभर में आंदोलन शुरू कर दिए हैं। आंदोलन को रोकने के लिए दिल्ली सहित कई राज्यों में धारा 144 लगाकर आंदोलन को रोकने का उपाय किया गया। जिसके कारण आंदोलनकारियों को आंदोलन करने की अनुमति नहीं मिली| बिना अनुमति आंदोलन करने के कारण पुलिस और आंदोलनकारियों के बीच अनावश्यक झड़पें हुई| पत्थरबाजी एवं लाठीचार्ज के कारण जगह-जगह आंदोलन हिंसक भी हुए पुलिस ने आंदोलनों को नियंत्रित करने के लिए लाठीचार्ज, अश्रु गैस तथा कई स्थानों पर गोली चालान भी किया। आंदोलन में लगभग दो दर्जन आंदोलनकारियों की मौत भी हुई। इसमें से कई मौतें गोली लगने से हुई दिल्ली और उत्तर प्रदेश पुलिस ने गोली चालाने से पहले इनकार किया। जब घटना के वीडियो सोशल मीडिया के माध्यम से सामने आए| इसमें पुलिस जवान गोली चलाते हुए दिखे। तब पुलिस ने जांच की बात कहकर मामले को ठंडा करने का प्रयास किया। जामिया विश्वविद्यालय के अंदर जाकर पुलिस ने लाइब्रेरी में बैठे छात्र और छात्राओं के ऊपर जबरदस्त बल प्रयोग किया। लाइब्रेरी कक्ष को तोड़ दिया लड़कियों के साथ भी मारपीट के वीडियो सामने आने और अलीगढ़ विश्वविद्यालय में भी कुछ इसी तरीके की पुलिसिया कार्रवाई से, सारे देश के छात्र आंदोलित हो गए पुलिस एवं सरकार अब बचाव की मुद्रा में आकर तरह-तरह के जवाब दे रहे हैं। सरकार विपक्षियों पर अफवाह फैलाने का ठीकरा फोड़कर बचने का प्रयास कर रही है।
लोकसभा एवं राज्यसभा में जिस ताबड़तोड़ तरीके से सिविलियन अमेंडमेंट एक्ट (जीएए) पास कराया गया। इसमें मुस्लिमों को नागरिकता देने से बाहर रखा गया। गृह मंत्री शाह ने जिस तरह से पाकिस्तान बांग्लादेश और अफगानिस्तान से आए । अल्पसंख्यकों को मान्यता देने और मुसलमानों को मान्यता नहीं देने की बात की साथ ही यह कहा कि इस बिल के पास होने के बाद सरकार जल्द ही सारे देश में एनआरसी की प्रक्रिया शुरू करेगी। गृह मंत्री के इस बयान की बड़ी तीव्र प्रतिक्रिया सबसे पहले असम से शुरू हुई। असम में 4 साल तक एनआरसी को लेकर असम के सभी नागरिकों को जिस तरह दस्तावेज जुटाने और नागरिकता को साबित करने परेशान होना पड़ा। हजारों रुपए दस्तावेज जुटाने में खर्च करने पड़े । अपना काम-धाम छोड़कर लाइनों में लगना पड़ा। असम में रहने वाले पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, झारखंड इत्यादि राज्यों के हजारों हिंदू नागरिकों को भी नागरिकता साबित करने में काफी परेशान होना पड़ा। उसके बाद भी लगभग 19लाख लोग नागरिकता रजिस्टर में स्थान नहीं पा पाए । इसमें से 14 लाख से अधिक लोग गैर मुस्लिम थे जो अन्य राज्यों से आकर आसाम में रह रहे भारतीय नागरिक थे। परिणाम स्वरूप सबसे ज्यादा उग्र प्रदर्शन सबसे पहले आसाम से शुरू हुआ।
भाजपा के रणनीतिकार केंद्रीय मंत्री अमित शाह ने सीएए पास कराते समय जिस तरह से मुस्लिमों को नागरिकता से दूर रखने का प्रावधान का उल्लेख किया। पाकिस्तान अफगानिस्तान और बांग्लादेश से आए हुए हिंदुओं, सिखों जिसमें ईसाई, जैन, बौद्ध एवं पारसियों को नागरिकता देने की बात कही। वही नागरिकता रजिस्टर में शामिल नहीं होने वाले मुस्लिमों को मुस्लिम देशों में नागरिकता मिलने की बात कही। उससे भारत के मुसलमान काफी उद्वेलित हो गए। उनके मन में यह भय बैठ गया, कि वह जरूरी दस्तावेज पेश नहीं कर सके तो उन्हें भारत से बाहर किया जाएगा, उन्हें डिटेंशन सेंटर में भेजा जाएगा।
इस एक्ट के पास होने के बाद हिंदू मुस्लिम ध्रुवीकरण पैदा करने की जो कोशिश की गई। निश्चित रूप से विभिन्न राज्यों जिसमें महाराष्ट्र, हरियाणा, झारखंड, दिल्ली और बिहार के चुनाव को ध्यान में रखकर केंद्र सरकार ने इस मामले में हिंदू मुस्लिम ध्रुवीकरण को ही ध्यान में रखकर इतना बड़ा कदम उठा लिया। इससे भारत के बहुसंख्यक हिंदू भी नाराज हो गए। प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से संविधान की मूल भावना के विपरीत धार्मिक आधार पर नागरिकता नहीं देने की बात पर बहुसंख्यक वर्ग का समर्थन भी इस एक्ट के विरोध में सारे देश में देखने को मिल रहा है। हिंदू बहुसंख्यक और गैर मुस्लिम अल्पसंख्यकों को एकजुट करने का जो फार्मूला भाजपा ने अपना आया। उस फार्मूले के दलदल में भाजपा बुरी तरह फंस कर रह गई है। अभी तक जो आंदोलन इस एक्ट के विरोध में हो रहे हैं। उसमें छात्रों के साथ-साथ बड़ी संख्या में हिंदू और अन्य वर्गों के लोग भी शामिल हो रहे हैं। भारतीय संविधान में सभी नागरिकों को धर्म की स्वतंत्रता दी गई है। भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने की जो कोशिश भाजपा ने अप्रत्यक्ष रूप से की है। उससे सारा देश नाराज है। पाकिस्तान, बांग्लादेश, अफगानिस्तान तथा तालिबान जैसे धार्मिक आधार पर बने देशों में जिस तरह से लड़ाई झगड़े कट्टरवादिता देखने को मिलती है। उससे उन राष्ट्रों का कोई भला नहीं हुआ। भारत का बहु संख्यक वर्ग भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने के खिलाफ है, यह आंदोलनों से स्पष्ट हो रहा है।


आधार के बाद एनआरसी क्यों
केंद्र सरकार ने आधार इनरोलमेंट के माध्यम से पिछले 10 वर्षों में प्रत्येक व्यक्ति का पंजीयन लगभग-लगभग कर लिया है। आधार पंजीयन के समय 33 तरीके के दस्तावेज एवं जानकारी के साथ आधार में पंजीयन किया गया है। आधार में पंजीयन के पूर्व प्रत्येक व्यक्ति का फिंगरप्रिंट एवं आंखों की पुतलियों का रिकॉर्ड भी फोटो के माध्यम से डिजिटल सुरक्षित किया गया है। आधार में जिन लोगों का पंजीयन हो चुका है। सारे देश में कहीं पर भी जांच एजेंसियों और सरकार के पास यह डाटा उपलब्ध है। आधार पंजीयन के समय पूर्व और वर्तमान सरकार ने यह भरोसा दिलाया था। आधार बनने के बाद अन्य किसी दस्तावेज अथवा पंजीयन की जरूरत नहीं होगी। सभी सरकारी कामकाज एवं सरकारी सहायता के लिए आधार अनिवार्य होगा। आधार में जब शत प्रतिशत पंजीयन हो गया है। इस जानकारी के आधार पर ही नागरिक रजिस्टर बनाने में भी कोई कठिनाई नहीं है। नई तरीके से सारी प्रक्रिया शुरू करने पर हजारों करोड़ रुपए खर्च करने का कोई औचित्य भी नहीं है। केंद्र सरकार चाहे तो आधार का जो डिजिटल डाटा उसके पास है। उसके आधार पर ही नागरिक रजिस्टर तैयार किया जा सकता है। इसे आधार से लिंक भी किया जा सकता है।


विदेशियों को भारतीय नागरिकता
दुनिया भर के देशों में बाहर से आए हुए लोगों को नागरिकता देने के लिए कानून बने हुए हैं। भारत में भी पहले से ही विदेशियों के लिए नागरिक कानून प्रचलित हैं। सभी सरकारें नागरिकता देने के नियम समय-समय पर बदलती रहती हैं। किसी भी देश में धर्म के आधार पर नागरिकता देने का कोई प्रावधान नहीं है। भारत दुनिया का पहला देश है, जिसने नागरिकता कानून में मुस्लिमों को प्रतिबंधित किया है। भारत में 20 करोड़ के आसपास मुस्लिम आबादी है। ऐसी स्थिति में मुसलमानों का भयभीत होना लाजमी है। भारत सरकार बिना किसी धार्मिक भेदभाव के राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखते हुए, किसी भी विदेशी को भारत की नागरिकता देती है| इसमें किसी को कोई आपत्ति नहीं है| किंतु जिस तरीके से इसे हिंदू मुस्लिम ध्रुवीकरण करने के लिए सीएए एक्ट राजनैतिकक कारणों से लाया गया है। उसकी प्रतिक्रिया इसी तरीके से होनी थी।


राष्ट्रीय जनगणना में हजारों करोड़ की बर्बादी क्यों
भारत में जनगणना का काम बीसवीं सदी में शुरू हुआ था। अब हम सूचना प्रौद्योगिकी एवं डिजिटल तकनीकी के 21वीं सदी में रह रहे हैं। आधार इनरोलमेंट के माध्यम से भारत सरकार ने सभी भारतीय नागरिकों का आधार इनरोलमेंट कर लिया है स्कूल में प्रवेश लेने के लिए सभी बच्चों को आधार इनरोलमेंट प्रस्तुत करना होता है। इसके साथ ही गरीब से गरीब व्यक्ति को जिसे सरकारी सहायता मिलती है। उसे भी आधार कार्ड प्रस्तुत करना पड़ता है। इसका आशय यह है कि 6 वर्ष की उम्र में प्रत्येक बच्चे का आधार में पंजीयन अनिवार्य होगा। भारत में जन्म और मृत्यु का पंजीयन अनिवार्य कर दिया गया है। यदि इसे आधार के डाटा से लिंक कर दिया जाता है, तो हर 6 वर्ष में जनसंख्या का डाटा डिजिटल माध्यम से प्रदर्शित किया जा सकता है। इसमें प्रत्येक व्यक्ति के माता पिता स्वयं की जानकारी, जन्म स्थान, आयकर ड्राइविंग लाइसेंस, वोटर कार्ड, राशन कार्ड, जन्म-मृत्यु प्रमाण, पंजीयन, धर्म, जाति एवं मूल निवास से संबंधित सभी जानकारी आसानी से उपलब्ध होगी।
अभी 10 वर्ष में जनगणना होती है। इसमें हजारों करोड़ रुपए भारत सरकार के प्रत्यक्ष रूप में खर्च होते हैं। 6 माह तक चलने वाले जनगणना की जानकारी एकत्रित करने के लिए हर राज्य के लाखों कर्मचारी और अधिकारी इस काम में लगते हैं। इसका डाटा तैयार करने में और कर्मचारियों की वेतन एवं अन्य खर्च में प्रत्येक 10 वर्ष में दो लाख करोड़ रुपए से अधिक केंद्र एवं राज्य सरकार का खर्च होता है। भारत सरकार ने सेल्फ सर्टिफिकेशन के माध्यम से राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर तैयार करने का काम 1 अप्रैल 2020 से 30 सितंबर 2020 तक कराने का निर्णय लिया है। इसमें प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से 2 लाख करोड रुपए से कम खर्च नहीं होंगे। केंद्र सरकार यदि आधार के डाटा के आधार पर राष्ट्रीय जनगणना रजिस्टर प्रत्येक 6 वर्ष में तैयार करें, तो इसमें 100 से 200 करोड़ रुपए खर्च करने में यह काम आसानी से होगा। जनगणना के दौरान 6 माह तक केंद्र एवं राज्य सरकारों का काम पूरी तरह अस्त-व्यस्त हो जाता है। वह भी नहीं होगा। आधार से जोड़कर प्रक्रिया अपनाने से हजारों करोड़ रुपए की केंद्र एवं राज्य सरकारों की बचत होगी। 
इस दिशा में सरकार को ध्यान देने की जरूरत है।