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 भाजपा का टूटा सपना
December 24, 2019 • R. K. SRIVASTAVA / NIRAJ PANDEY • लेख

झारखंड चुनाव में सत्ता झामुमो गठबंधन के हाथ लगी है और भाजपा सत्ता में वापसी का सपना टूट गया है। वर्ष 2014 में आजसू, जेडीयू और एलजेपी के साथ मिलकर चुनाव लडऩे वाली भाजपा इस बार अकेले ही चुनाव में उतरी थी। कहा जा रहा था कि यदि इस राज्य में भाजपा एक बार फिर से सत्ता हासिल करती तो राज्य के गठन के बाद यह पहला अवसर होता, जब कोई सरकार वापसी करती। मगर ऐसा होता नहीं दिखा है। बता दें कि सीएम के तौर पर 5 साल का कार्यकाल पूरा करने वाले भी रघुबर दास पहले मुख्यमंत्री हैं। वैसे भाजपा के सत्ता गंवाने के कई कारण है। पहला आजसू के साथ गठबंधन न होना, दूसरा मुख्यमंत्री पद के लिए आदिवासी चेहरे का नदारद रहना और तीसरा चुनाव में स्थानीय मुद्दों से परहेज किया जाना प्रमुख हैं। साल 2000 में वजूद में आने के बाद से ही झारखंड राजनीतिक अस्थिरता का दूसरा नाम रहा है। 19 सालों के राज्य के इतिहास में रघुबर दास इकलौते ऐसे मुख्यमंत्री रहे जिन्होंने अपना कार्यकाल पूरा किया। वरना कोई भी मुख्यमंत्री अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाया।
नतीजे आने के बाद यह भी पूछा जा रहा है कि क्या आजसू से अलग चुनाव लड़कर भाजपा ने कहीं सियासी गलती कर दी? कहा जा रहा है कि भाजपा और आजसू यदि मिलकर चुनाव लड़तीं तो सूबे की सियासी तस्वीर दूसरी होती और स्पष्ट बहुमत के साथ सत्ता में विराजमान होती। झारखंड के चुनाव में भाजपा ने 79 सीटों पर अपने प्रत्याशी उतारे थे। जबकि, आजसू ने 58 सीटों पर उम्मीदवार उतारे। ऐसे में यह साफ है झारखंड की 81 विधानसभा सीटों में से 58 सीट पर भाजपा-आजसू प्रत्याशी आमने-सामने थे और दोनों दलों के बीच वोट का बंटवारा का। आजसू ने पांच ऐसी सीटों पर भी उम्मीदवार उतारकर भाजपा को चुनौती दे दी थी, जो भाजपा के कब्जे वाली थीं। इस तरह से अगर दोनों पार्टियां एक साथ चुनाव के मैदान में उतरतीं तो इन 58 सीटों पर दोनों दलों के वोट एकमुश्त मिलते। इस तरह से भाजपा और आजसू को स्पष्ट बहुमत मिलता। 
बता दें कि कि झारखंड बनने के बाद से भाजपा और आजसू साथ रही हैं, लेकिन इस बार चुनाव में सीट शेयरिंग फॉर्मूले को लेकर बात नहीं बन सकी इसके चलते दोनों पार्टियां अलग-अलग होकर मैदान में उतरी थी। इसके चलते सियासी परिदृश्य बदल गया था और इसका चुनावी नतीजों पर भी दिखा। 2014 में आजसू आठ विधानसभा सीटों पर लड़कर पांच सीटें जीती थीं। आजसू ने इस बार के चुनाव में शुरुआत से ही भाजपा से 17 सीटें मांगी थीं, लेकिन भाजपा इस पर राजी नहीं हुई। इस चुनाव में भाजपा और कांग्रेस के टिकट कटने से नाराज नेताओं की पहली पसंद भी आजसू बनी, जिसका लाभ पार्टी प्रमुख सुदेश महतो ने भरपूर तरीके से उठाया। अब जब नतीजे आ गए हैं तो भाजपा को इसे सकारात्मक ढंग से लेना होगा और नतीजों का विश्लेषण कर आगे की सोचना होगा। 
इस चुनाव की अच्छी बात यह रही कि झारखंड की जनता ने इस बार भी नए सरकार के लिए स्पष्ट जनादेश दिया। जेएमएम, कांग्रेस और आरजेडी गठबंधन ने 81 सीटों की प्रदेश विधानसभा में बहुमत के लिए जरूरी 41 सीटों के जादुई आंकड़े को पार कर कुल 47 सीटों पर कब्जा जमा लिया है। जेएमएम को 30, कांग्रेस को 16 जबकि आरजेडी को एक सीट पर जीत मिली है। 2014 के चुनाव में भी राज्य में बीजेपी, ऑल झारखंड स्टूडेंट्स यूनियन (आजसू) गठबंधन को 42 सीटें मिली थीं। तब बीजेपी को 37 और सुदेश महतो की पार्टी आजसू को पांच सीटें मिली थीं। यानी, बहुमत के जरूरी आंकड़े से एक ज्यादा। इससे पहले साल 2000, 2005 और 2009 के विधानसभा चुनावों में किसी भी दल अथवा गठबंधन को स्पष्ट जनादेश नहीं मिला और न कोई मुख्यमंत्री पांच साल का कार्यकाल पूरा कर सका। 2014 के विधानसभा चुनाव में पहली बार बीजेपी गठबंधन ने स्पष्ट जनादेश के साथ रघुवर दास की सरकार बनाई जिसने पांच साल का कार्यकाल पूरा किया।