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(16 दिसंबर विजय दिवस विशेष) निर्भीक इंदिरा के निर्णय से भारत का “विजय” और बांग्लादेश का “उदय” दिवस
December 15, 2019 • R. K. SRIVASTAVA / NIRAJ PANDEY • लेख

जब भी साहस, निडर, अडिग और दृढ़ निश्चय जैसे शब्दों का जिक्र वैश्विक जन नेताओं और महान विभूतियों के लिये होता है तो हमारे सामने कुछ सशक्त चेहरे घूमने लगते हैं, इन्हीं चेहरों में एक जाना पहचाना चेहरा होता है देश की एकमात्र महिला प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी का। इंदिरा जी को उनके साहसिक निर्णयों और राजनीतिक दृढ़ता के लिये जाना जाता है। उनके साह‍सिक फैसलों के कारण ही उन्हें भारत की 'जॉन ऑफ आर्क' और 'आयरन लेडी' भी कहा जाता है। फ्रांस की जॉन ऑफ आर्क ने अंग्रेजों के खिलाफ आजादी के लिए युद्ध किया था और शहीद हुई थी। महज 17 साल की अवस्था में जॉन ने फ्रांसीसी सेना का नेतृत्व किया और स्वदेश के लिए अपने प्राण न्यौछावर कर दिये थे। जॉन ऑफ आर्क से ही प्रेरित इंदिरा गांधी ने देश की आजादी की लड़ाई के लिए बचपन में ही अपने दोस्तों को लेकर एक छोटी सी सेना बनाई थी। इंदिरा गांधी में अदम्य साहस था जब तक वो जिंदा थीं उन्हें कोई भी विपदा और वैश्विक शक्ति दबा नहीं पायी।
इंदिरा जी ने भारत के संदर्भ में कई ऐसे फैसले लिये, जिनका वैश्विक स्तर पर ऐतिहासिक प्रभाव हुआ और भारत एक मजबूत राष्ट्र के रूप में दुनिया के सामने उभरा। भारत की सार्वभौमिकता का वैश्विक शक्तियों को अहसास कराने के लिए उन्होंने बांग्लादेश के मुद्दे पर भारत-पाक युद्ध की परिस्थितियों को स्वीकारा और बांग्लादेश को एक स्वतंत्र राष्ट्र की मान्यता दिलाई। उनका कार्यकाल एक युग के तौर पर रेखांकित किया जाता है। इंदिरा जी अपनी प्रतिभा और राजनीतिक दृढ़ता के लिए विश्व राजनीति के इतिहास में जानी जाती हैं। वह खुद पर यकीन करती थीं और दूसरों को निडर व साहसी बनने की प्रेरणा देती थीं।
इंदिरा जी के शब्दों में 'साहस' :-
"साहस के बिना आप किसी भी अन्य सद्गुण का पालन नहीं कर सकते। आपमें विभिन्न प्रकार का साहस होना चाहिए। विभिन्न मूल्यों को सुलझाने के लिए आपमें बौद्धिक साहस होना चाहिए। जो आपकी दृष्टि में सही है, उस पर अटल रहने के लिए नैतिक साहस चाहिए। आपमें शारीरिक साहस भी होना चाहिए, क्योंकि जिस मार्ग पर आप चलना चाहते हैं वो कभी-कभी कठिनाईयों से भरा होता है।'

अमेरिका की परवाह न करते हुये पाकिस्तान को दी मात
बांग्लादेश की आजादी में निभाया अहम योगदान
इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्री काल की कई निर्णायक घटनाएँ हैं, उन्हीं में से एक है 1971 में पूर्वी पाकिस्तान यानी कि बांग्लादेश की स्वतंत्रता। पूर्वी पाकिस्तान के लोगों ने पश्चिमी पाकिस्तान के खिलाफ अपनी आजादी के लिए युद्ध छेड़ा हुआ था। इंदिरा जी ने अपार नैतिक और राजनीतिक समर्थन के माध्यम से पाकिस्तानी सेना के बर्बर उत्पीड़न से पलायन करने वाले लाखों लोगों को भारत में शरण लेने की अनुमति दी। एक शांतिपूर्ण समाधान के लिए उन्होंने दुनिया के कई देशों की राजधानियों का दौरा किया और जब दुनिया के सबसे शक्तिशाली देश इस पर प्रतिक्रिया देने में विफल रहे तो उन्होंने पाकिस्तान के आक्रामक उकसाने वाले रवैए का जवाब देना उचित समझा और पाकिस्तान की सेना का मुकाबला करने के लिए भारतीय सेना को भेजा। अमेरिका तथा चीन की ताकत के सामने दृढ़ता से खड़े रहते हुए उन्होंने एक नए राष्ट्र बांग्लादेश के सृजन में सहायता की। इंदिरा जी ने जब ये काम किया तो अमेरिका का बड़ा दबाव था कि भारत किसी भी हालत में पूर्वी पाकिस्तान में कोई कार्रवाई नहीं करेगा। अगर उसने ऐसा कुछ किया तो अमेरिका भारत से खिलाफ कार्रवाई के लिए अपना बेडा हिंद महासागर में भेज देगा, लेकिन इंदिरा जी इस धमकी के बाद भी नहीं डरीं।
इंदिरा गांधी भारत की ऐसी प्रधानमंत्री हैं, जिन्होंने पाकिस्तान को ऐसा सबक सिखाया, जिसे वो कभी नहीं भूल सकता। पाकिस्तान को इससे बड़ा झटका आज तक किसी ने नहीं दिया। दरअसल नवंबर 1971 में इंदिरा गांधी अमेरिका गईं थीं। वहां अमेरिका के राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने उन्हें ऐसा कुछ नहीं करने के लिए आगाह किया था, लेकिन भारत लौटते ही उन्होंने भारतीय फौजों को पूर्वी पाकिस्तान में कार्रवाई शुरू करने का आदेश दिया। वर्ष 1971 के युद्ध में इंदिरा जी के आदेश पर भारतीय फौजों ने तीन दिसंबर को पूर्वी पाकिस्तान में प्रवेश किया और 13 दिन बाद 16 दिसंबर 1971 को पाकिस्तान की सेना के 93 हजार सैनिकों से ढाका में आत्मसमर्पण कराते हुये नया बांग्लादेश देश बनवाकर लौटीं।
 पाकिस्तान के साथ हुई इस लड़ाई के बारे में इंदिरा गांधी ने कहा था कि भारत उस माहौल में चुपचाप बैठकर तमाशा नहीं देख सकता था। पुस्तक 'मेरा सत्य इंदिरा गांधी' में 1971 के युद्ध पर इंदिरा जी के एक भाषण का उल्लेख है उसमें लिखा है '...मुझे कोई शक नहीं था कि बांग्लादेशी अपनी स्वतंत्रता की लड़ाई जीतेंगे। एकमात्र सवाल यह था कि यह कब होगा और सीमा की बाड़ के किस ओर हम होंगे। ... यह एक निर्णायक सैन्य विजय थी, इस बारे में कोई संदेह नहीं है। लेकिन, मुझे गर्व स्वयं पर नहीं, बल्कि सेना पर है। यह काम बड़ी सफाई से किया गया। यह सेना के नेतृत्व और सशस्त्र बलों के बीच उत्कृष्ट संबंध के कारण संभव हुआ। मैं उनके साथ लगातार संपर्क में रही।...' 1971 के युद्ध दौरान ऐसा भी समय था जब भारतीय फौजें चाहतीं तो पश्चिम में पाकिस्तानी सीमा के अंदर तक जाकर उसके इलाके को हड़प सकती थीं, लेकिन इंदिरा जी ने ऐसा नहीं किया। उन्होंने मॉस्को के जरिए वाशिंगटन को संदेश भिजवाया कि पाकिस्तानी सीमाओं को हड़पने का उनका कोई इरादा नहीं है। उन्हें जो करना था, उन्होंने वो कर दिया। 1971 युद्ध के बाद तत्कालीन नेता प्रतिपक्ष अटल बिहारी वाजपेयी ने इंदिरा जी को दुर्गा की संज्ञा देते हुए उनका सम्मान किया था।
इंदिरा गांधी को मरणोपरांत 'बांग्लादेश स्वतंत्रता सम्मान' दिया गया है, जो विदेशी नागरिकों को दिया जाने वाला बांग्लादेश का सर्वोच्च सम्मान है। उनके प्रशस्ति पत्र में लिखा है, '...बांग्लादेश के मुक्ति संग्राम के वक्त विपरीत परिस्थितियों के बावजूद इंदिरा गांधी शुरू से आखिर तक यहां के लोगों के साथ खड़ी रहीं। ...राजनयिक बाधाओं के बावजूद उन्होंने मुक्ति संग्राम को हौसला दिया। बंग बंधु को पाकिस्तानी जेल से मुक्त करवाने में भी उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही। बांग्लादेश के मुक्ति संग्राम में उनके योगदान को हमेशा याद रखा जाएगा।'