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निर्भया को न्याय
January 9, 2020 • R. K. SRIVASTAVA / NIRAJ PANDEY • लेख


पूरे देश को झकझोर देने वाले निर्भया कांड में अदालत ने मंगलवार को चारों दरिंदों को डेथ वारंट यानी फांसी देने का समय तय कर दिया। सात साल पुराने मामले में पटियाला हाउस कोर्ट ने चारों दोषियों अक्षय सिंह, विनय कुमार शर्मा, मुकेश कुमार और पवन गुप्ता को 22 जनवरी की सुबह सात बजे फांसी देने का आदेश दिया। बता दें कि 16 दिसंबर, 2012 को दक्षिणी दिल्ली इलाके में चलती बस में 23 साल की पैरामेडिकल छात्रा 'निर्भयाÓ से गैंगरेप किया गया था। 29 दिसंबर को सिंगापुर में इलाज के दौरान पीडि़ता की मौत हो गई थी। इस मामले में पुलिस ने बस चालक सहित छह को गिरफ्तार किया था। इनमें से एक नाबालिग भी था। उसे तीन साल तक सुधार गृह में रखने के बाद रिहा कर दिया गया था। एक आरोपी राम सिंह ने जेल में खुदकुशी कर ली थी। चारों आरोपियों को फांसी की सजा देने से निर्भया को भले ही इंसाफ मिल जाए, मगर देश में अब भी ऐसी कई निर्भया हैं जो इंसाफ के लिए इंतजार कर रही हैं। लगातार बढ़ते जा रहे बलात्कार के केस हमारी व्यवस्था को कोस रहे हैं। न्याय की गति बढ़ाने के उपाय मंद पड़े हैं। ऐसे में सिर्फ एक मामले में हुए न्याय को हम पूरे देश की बेटियों की जीत नहीं बता सकते। ऐसा कर हम उन बेटियों के घाव पर मरहम तो लगा सकते हैं, मगर उन्हें यह कह पाने का माद्दा नहीं रखते कि सभी का फैसला जल्द होगा। निर्भया कांड को ही देखें तो दोषियों को सजा देने में सात साल का वक्त लग गया। पीडि़त परिवार इन वर्षों में हर रोज मरकर जिया होगा। उसके दुख और पीड़ा की हम कल्पना भी नहीं कर सकते। ऐसी न जाने कितनी पीडि़त होंगी, जो आज अपने दर्द से घुट-घुटकर मर चुकी होंगी। न्याय का इंतजार जितना लंबा होता है, उसकी टीस उतनी ही गहरी। इसलिए हमें एक ऐसी व्यवस्था बनानी होगी, जो कम से कम बलात्कार के मामलों में सजा देने की दर को बढ़ाए। 
अगर निर्भया के मामले को ही देखें तो डेथ वारंट जारी होने के बाद भी चारों को फांसी की सजा 22 जनवरी को दी जाएगी, इसमें संदेह है। दोषियों के वकील यह दावा कर रहे हैं कि उनके पास अभी कुछ और कानूनी विकल्प हैं। नि:संदेह जघन्य अपराध के दोषियों को भी उपलब्ध कानूनी विकल्प इस्तेमाल करने का अधिकार है, लेकिन सबको पता है कि इन विकल्पों की आड़ में किस तरह तारीख पर तारीख का खेल खेला जाता है। यह केवल हास्यास्पद ही नहीं, बल्कि शर्मनाक भी है कि 2012 के जिस मामले ने पूरे देश को थर्रा दिया था, उसके दोषियों की सजा पर अमल अब तक नहीं हो सका है और वह भी तब, जबकि सर्वोच्च न्यायालय ने अपना फैसला 2017 में ही सुना दिया था। इसके बाद जो कुछ हुआ, वह न्याय प्रक्रिया की कच्छप गति को ही बयान करता रहा। न्याय प्रक्रिया की सुस्त रफ्तार से न्यायिक और प्रशासनिक व्यवस्था के शीर्ष पदों पर बैठे लोग अनजान नहीं, लेकिन दुर्भाग्य से उन परिस्थितियों का निराकरण होता नहीं दिखता, जिनके चलते समय पर न्याय पाना कठिन है।
बलात्कार-हत्या जैसे जघन्य अपराधों में जिस तेजी से मामलों का निपटारा होना चाहिए, वह मौजूदा न्यायिक व्यवस्था में बेहद मुश्किल है। न्यायिक प्रक्रिया इतनी लंबी खिंचती चली जाती है कि कई बार न्याय की उम्मीद खत्म हो जाती है। निर्भया कांड को सात साल हो चुके हैं। लेकिन अभी तक बचाव पक्ष के लोग कानूनी दांवपेंचों का सहारा लेते हुए बचाव का कोई न कोई रास्ता निकालने की जुगत में हैं। वरना एक दोषी का वकील अदालत के समक्ष ऐसा विचित्र तर्क क्यों रखता कि दिल्ली में बढ़ते प्रदूषण के कारण जीवन छोटा होता है, उसके मुवक्किल के साथ अन्याय हुआ है, या उसका मामला मीडिया के दबाव से प्रभावित रहा है। जबकि हकीकत यह है कि इस मामले में मीडिया और देशभर में चले आंदोलन से जो दबाव बना, उसी से अदालतों ने भी इसमें फुर्ती दिखाई। वरना देशभर में हजारों मामले ऐसे होंगे जो सालों से लटके पड़े होंगे और जिनकी सुनवाई के बारे में किसी को कोई खबर नहीं होगी। अपराधी, आरोपी और दोषी न्यायिक व्यवस्था की इसी खामी का फायदा उठाते हैं और ज्यादातर मामलों में सजा नहीं हो पाती।
निर्भया कांड के बाद महिला सुरक्षा की दिशा में केंद्र सरकार ने जो कदम उठाए, जिस तरह के सख्त कानून बनाए, राज्यों को ऐसे मामलों से निपटने के लिए जो कड़े निर्देश दिए थे, वे एक तरह से बेअसर ही साबित हुए। राज्यों ने इस दिशा में कोई उल्लेखनीय कदम नहीं उठाया। बिहार, उत्तर प्रदेश सहित देश के तमाम राज्यों महिलाओं के प्रति ऐसे अपराधों का ग्राफ काफी ऊंचा है। उत्तर प्रदेश के उन्नाव कांड तक ने सबको हिला दिया था। आरोपी सत्तारूढ़ दल का विधायक था, इसलिए लंबे समय तक बचता रहा। सात साल में उत्तर प्रदेश में ऐसी न जाने कितनी वारदात हुई हैं, लेकिन किसी भी मामले में पीडि़त पक्ष को न्याय नहीं मिला। ऐसे मामलों के निपटारे के लिए कुछ दिन पहले ही उत्तर प्रदेश सरकार ने त्वरित अदालतोंके गठन का फैसला हुआ है। पीडि़तों को न्याय दिलाने के प्रति सरकार की उदासीनता एक बड़ी समस्या है। इसी से अपराधियों के हौसले बुलंद होते हैं। अदालतों की अपनी मजबूरियां हैं। स्थानीय पुलिस की भी इसमें बड़ी भूमिका रहती है। अपराधियों को अक्सर मिलने वाला राजनीतिक संरक्षण किसी से छिपा नहीं है। ऐसे में महिलाएं कैसे सुरक्षित रहेंगी, यह गंभीर सवाल है।